Corona Warrior Interview

मैं अब अंतहीन सामाजिक लड़ाई का हिस्सा हूँ : योगिता भयाना

सरकारी हेल्पलाइन लगातार उन कोरोना वारियर्स की कहानी आप तक पहुँचा रहा है जो इस वैश्विक लड़ाई में अपने जीवन के कीमती पल लोगों की सेवा में व्यतीत कर रहे हैं। आज हम उस समाज सेविका की बात कर रहे हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन केवल समाज के नाम कर दिया है। महिलाओं के अधिकार की लड़ाई हो या फिर निर्भया को इंसाफ दिलाने की एक लम्बी लड़ाई, महिलाओं के हर मुद्दों पर उनकी आवाज़ उठाने वाली योगिता भयाना से खास बातचीत कर यह जानने की कोशिश करी कि कोरोना में पीडित लोगों को कैसे मदद पहुँचा रही हैं और क्या-क्या परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है ?

सवाल: पहले निर्भया के लिए कई वर्षों की लम्बी लड़ाई और अब कोरोना में वापस पुनः सडकों पर, किस प्रकार मदद कर रही हैं ?

जवाब: इतने लंबे इंतजार के बाद जब निर्भया के दरिंदों को फांसी हुई, जो इतना हमने संघर्ष किया निर्भया के माता पिता के साथ। तो 20 तारीख के बाद लगा कि बीच मे थोड़ा समय मिलेगा जब हम सुकून की सांस लेंगे, रिलैक्स करेंगे और उसके बाद वापस अन्य महिलाओं और निर्भयाओं के लिए लड़ाई को ज़ारी रखेंगे लेकिन एक सुकून की जो घड़ी थी उसे महसूस करने का भी समय नहीं मिला, उस घड़ी को एन्जॉय करने का भी समय नहीं मिला और कोरोना का कहर बढ़ गया, लॉक डाउन की भी उसी दौरान घोषणा हुई। फिर सोचा कि इसमें मै क्या और कैसे योगदान कर पाउँगी। पहले दिन जब पीएम मोदी ने लॉकडाउन की घोषणा की तब पहला सवाल मेरे मन मे यही आया था कि कोरोना का तो पता नहीं लेकिन भुखमरी बहुत बड़ी बात होने वाली है और वही हुआ। पहले दिन से ही अपने घर से लंगर की शुरुआत करी लेकिन उससे मेरे मन को संतुष्टि नहीं मिली तब मैं सड़कों पर उतरी और लगा कि बहुत बड़े पैमाने पर पहुंचने की जरूरत है, खासकर जब आप्रवासियों ने निकलना शुरू कर दिया था।

सवाल: लॉक डाउन की वजह से महिलाओं को सेनेटरी पैड की कमी और कई तरह की परेशानियों से गुजरना पड़ रहा है, क्या आप उन तक पहुँच पा रही है ?

जवाब: महिलाओं को तो दोहरी मार है, एक तो भुखमरी की और दूसरा मासिक धर्म स्वच्छता की भी काफ़ी दिक्कतें हैं। इसीलिए महिलाओं की समस्या दोगुनी हो जाती हैं। इस पर भी हमारे सहयोगी एनजीओ भी काम कर रहें हैं। इसमे कुछ भागेदारी मेरी भी रहती है लेकिन मेरा मुख्य फ़ोकस पोषण पर ही रहता है। अब जाकर हमने सैनिटरी नैपकिन भी बांटने शुरू किए है।

सवाल: ऐसे मामले जहाँ हम सब जानते हैं, कौन दोषी है, यहाँ तक कि कानून भी अवगत होता है उसके बावजूद कई साल तक इन्साफ नही मिलता, फिर भी कैसे हिम्मत जुटाती है ?

जवाब: कानून की प्रक्रिया को मैंने सामने से देखा है, निर्भया की प्रत्येक सुनवाई में मैं गई हूँ, चाहे वो निचली अदालत हो, हाई कोर्ट हो या फिर सुप्रीम कोर्ट। साथ ही ऐसे नाजाने कितनी बच्चियों के न्यायिक मामले हैं जिनमें मैं लगातार कोर्ट जाती हूँ तो एक संयम रखने वाली बात होती है क्योंकि हमारी न्यायपालिका प्रणाली ऐसी है कि सब जानते हैं कितनी धीमी प्रक्रिया है, यहां तक कि फ़ास्ट ट्रैक के नाम पर भी तारीख पर तारीख ही मिलती है। निर्भया के समय पर भी अंत मे जो हुआ सब जानते है ना जाने कितने फांसी के आदेश ज़ारी होने के बाद भी रद्द हो जाते थे तो निश्चित रूप से संयम तो रखना ही पड़ा है। हमारा सिस्टम ही ऐसा है लेकिन उसी प्रणाली में बदलाव के लिए मैंने सोचा था कि जब निर्भया के दरिंदों को फांसी हो जाएगी तब इस बदलाव के लिए कार्य करूँगी। इसके लिए मैंने एक मुहीम छेड़ी भी थी जिसमे हमने पार्लियामेंट में महिलाओं के लिए विशेष सत्र पर चर्चा हेतु मांग भी की थी परंतु कोरोना के कहर ने अभी रोक लगा दी है। लेकिन कोरोना महामारी से लड़ने के बाद जब स्थिति ठीक हो जाएगी तो निश्चित ही हम इस पर आगे काम करेंगे।

सवाल: ऐसे मामले जहाँ हम सब जानते हैं, कौन दोषी है, यहाँ तक कि कानून भी अवगत होता है उसके बावजूद कई साल तक इन्साफ नही मिलता, फिर भी कैसे हिम्मत जुटाती है ?

जवाब: कानून की प्रक्रिया को मैंने सामने से देखा है, निर्भया की प्रत्येक सुनवाई में मैं गई हूँ, चाहे वो निचली अदालत हो, हाई कोर्ट हो या फिर सुप्रीम कोर्ट। साथ ही ऐसे नाजाने कितनी बच्चियों के न्यायिक मामले हैं जिनमें मैं लगातार कोर्ट जाती हूँ तो एक संयम रखने वाली बात होती है क्योंकि हमारी न्यायपालिका प्रणाली ऐसी है कि सब जानते हैं कितनी धीमी प्रक्रिया है, यहां तक कि फ़ास्ट ट्रैक के नाम पर भी तारीख पर तारीख ही मिलती है। निर्भया के समय पर भी अंत मे जो हुआ सब जानते है ना जाने कितने फांसी के आदेश ज़ारी होने के बाद भी रद्द हो जाते थे तो निश्चित रूप से संयम तो रखना ही पड़ा है। हमारा सिस्टम ही ऐसा है लेकिन उसी प्रणाली में बदलाव के लिए मैंने सोचा था कि जब निर्भया के दरिंदों को फांसी हो जाएगी तब इस बदलाव के लिए कार्य करूँगी। इसके लिए मैंने एक मुहीम छेड़ी भी थी जिसमे हमने पार्लियामेंट में महिलाओं के लिए विशेष सत्र पर चर्चा हेतु मांग भी की थी परंतु कोरोना के कहर ने अभी रोक लगा दी है। लेकिन कोरोना महामारी से लड़ने के बाद जब स्थिति ठीक हो जाएगी तो निश्चित ही हम इस पर आगे काम करेंगे।

सवाल: निजी जीवन और सामाजिक जीवन के साथ कैसे तालमेल बैठाती है ?

जवाब: एक सामाजिक कार्यकर्ता होने के नाते, इस बात को मैंने महसूस किया है कि निजी जीवन और सामाजिक में निश्चित रूप से संतुलन की बहुत ज़रूरत पड़ती है। कहीं न कहीं परिवार वालों को ये समझ में आ ही जाता है कि इनका मिशन और लक्ष्य क्या है तो वो भी आपका सहयोग करतें हैं। अगर उनका सहयोग हो तो संतुलन बनाना बहुत आसान है अन्यथा बहुत मुश्किल है। और ऊपर वाले की दुआ से मुझे हमेशा मेरे परिवार का सहयोग ही मिला है इसीलिये मैं इस कार्य को भी ज़ोरशोर से कर पा रही हूं।

सवाल: महिलाओं के लिए भविष्य में उनकी मदद के लिए कोई खास योजना ?

जवाब: जैसा कि मैंने बताया कि मैंने पार्लियामेंट में महिलाओं के लिए विशेष सत्र पर चर्चा हेतु मांग भी की थी जिसके लिए मैंने change.org पर याचिका भी चलाई थी, जिसका 1 लाख से ज्यादा लोगों ने और पार्लियामेंट के सदस्यों ने सहयोग भी किया है। बजट सत्र के बाद उम्मीद थी कि स्पीकर द्वारा इसका अनुमोदन भी हो गया था लेकिन अब हम इंतजार कर रहें हैं कि जब सारी स्थिति सामान्य हो जाएगी उसके बाद इसी मुद्दे पर लड़ा जायेगा कि महिलाओं के मुद्दों पर चर्चा भी होनी चाहिए और उसी में उसका हल भी निकलना चाहिए, यही हमारी मांग है।

सवाल: आपने एक संगठन परी बनाया है, उसके माध्यम से क्या कार्य कर रही हैं ?

जवाब: परी (PARI) यानी पीपल अगेंस्ट रेपस इन इंडिया का एक ही उद्देश्य है “निवारण”, अगर हम किसी भी तरह के यौन अपराध या महिलाओं और बच्चों के साथ किसी भी तरह के अपराध को रोक कैसे रोक पाए। साथ ही एक उद्देश्य ये भी है कि अगर अपराध हो गया है तब उस पर कैसे कार्य करें, कैसे उनकी मदद करें, चाहे वो इंसाफ की लड़ाई हो, चिकित्सा उपचार हो ,कानूनी लड़ाई, पुनर्वास, शिक्षा, या फिर मानसिक स्थिति कैसे ठीक हो सके, एक रेप पीड़िता के साथ बहुत सारे कार्य होते हैं और (PARI) पीपल अगेंस्ट रेपस इन इंडिया इन सभी कार्यो को हाथ पकड़ कर चलाना जैसा होता है उन सभी में कार्यरध है।

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