केजरीवाल के झूठे वादों से बेहाल दिल्ली, जानिये केजरीवाल के 5 सबसे बड़े झूठ
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केजरीवाल के झूठे वादों से बेहाल दिल्ली, जानिये केजरीवाल के 5 सबसे बड़े झूठ

देश की राजधानी दिल्ली की जनता को आज भी आधारभूत आवश्यकताओं जैसे की पीने योग्य पानी, सड़क, चिकित्सा, शिक्षा और प्रदूषण जैसी समस्याओं से आज भी दो-चार होना पड़ रहा है | दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव में मजबूती से वापसी करते हुए अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में पुनः दिल्ली में सरकार स्थापित करने में सफल रही परन्तु देश की राजधानी के हाल पहले की तरह आज भी बेहाल ही नजर आ रहे हैं | दिल्लीवासियों के लिए आज भी कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिनको लेकर दिल्ली सरकार ने बड़े-बड़े वादे किये थे लेकिन आज तक उन पर अमल नही हो सका है |

  • पीने योग्य पानी– दिल्ली में आज भी पीने योग्य साफ पानी के लिए दिल्लीवासियों को मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है, यह समस्या केवल जेजे क्लस्टर या झुग्गियों तक ही सीमित नही है बल्कि दिल्ली के पोर्श एरिया में शामिल रोहिणी, पंजाबी बाग, शालीमार बाग, साउथ एक्सटेंशन जैसे कई क्षेत्र हैं जहाँ भी लोगों को साफ़ पानी की समस्या से गुजरना पड़ रहा है, दिल्ली सरकार के अंतर्गत आने वाले जल बोर्ड जो कि पहले लगभग 50 करोंड के मुनाफे के साथ चल रहा था लेकिन कुछ वर्षों में ही अनुमानतः 500 करोंड के घाटे में जल बोर्ड चल रहा है, ऐसे में भविष्य में भी पानी की समस्या से निजात मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नही है | 

सड़क- दिल्ली में पानी पीने के लिए मिलना तो कई बार मुश्किल भरा हो सकता है लेकिन सडकों पर आपको पानी की कोई कमी देखने को नही मिलेगी, दिल्ली में मुख्य रूप से प्रमुख सडकों के निर्माण की जिम्मेदारी दिल्ली सरकार के अंतर्गत आने वाले पीडब्ल्यूडी और अनधिकृत क्षेत्रों में फ्लड एवं इरीगेशन के पास है, परन्तु दिल्ली की कॉलोनियों में सडकों के हालत इस कदर बद से बदतर है कि इन सड़कों पर गाडी तो दूर पैदल चलना भी संभव नही है, जिसमे से दिल्ली का किराड़ी और संगम विहार पूरे वर्ष पानी में डूबे रहते हैं | जबकि दिल्ली सरकार ने अपने नए कार्यकाल में अनधिकृत कॉलोनियो के लिए 1700 करोंड का बजट आवंटित किया था और वहीँ सडकों की डिजाईन बदलने के लिए 193 करोंड रुपये आवंटित किये थे, लेकिन वास्तविक तौर पर इन दोनों ही बजटों का इस्तेमाल पुरी दिल्ली में न के बराबर नजर आ रहा है |

  • चिकित्सा-चिकित्सा के क्षेत्र में दिल्ली सरकार की व्यवस्था पूरी तरह से चरमराई हुई है, जिसका असर केन्द्र शासित अस्पतालों जैसे कि एम्स और सफदरजंग में देखने को मिल रहा है, ये दोनों ही अस्पताल के देश के सबसे बड़े अस्पतालों में शुमार है परन्तु राज्यस्तरीय अस्पतालों की स्थिति बेहतर न होने के कारण इन अस्पतालों पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है, इसका खामियाजा कहीं न कहीं दिल्ली की ही जनता नही बल्कि देश की जनता को भुगतना पड़ रहा है, दिल्ली देश की राजधानी होने के नाते सदैव दबाव में रहती है जिसके चलते यहाँ पर इलाज के लिए देश के अलग-अलग राज्यों से लोग आते हैं परन्तु अस्पतालों की हालत बेहद गंभीर होने के चलते उन्हें मजबूरन निजी अस्पतालों की ओर रुख करना पड़ता है जिसका खर्च व्यव कर पाना उनके लिए असंभव समान होता है | दिल्ली सरकार ने अपने नए कार्यकाल में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए 7,704 करोंड का फण्ड आवंटित किया था जिसमे यहाँ भी बताया गया था कि 724 करोंड की लगत से नए अस्पतालों का निर्माण कराया जायेगा, परन्तु अभी तक जमीनी हकीकत कुछ और ही बताती है |

शिक्षा-केजरीवाल ने सरकार बनने के पहले कार्यकाल से लेकर नए कार्यकाल तक शिक्षा पर काफी जोर दिया लेकिन यह वादा भी सरकार के अन्य वादों की तरह ठंडे बस्ते में ही पड़ा हुआ है, अपने बजट में 145 नए स्कूल ऑफ़ एक्सीलेंस खोलने का वादा किया था लेकिन अभी तक बमुश्किल 5 स्कूल ही बन सके हैं जिनका कार्य पहले कार्यकाल में शुरू हुआ था, दिल्ली सरकार ने यह भी घोषणा की थी कि 17 नए स्कूल भी खोलेगी और दिल्ली सरकार का अपना एजुकेशन बोर्ड होगा लेकिन यह सब अभी तक ठंडे बस्ते में ही पड़ा हुआ है |

प्रदूषण-दिल्ली में प्रदूषण अब एक बुनियादी समस्या के तौर पर उभर कर आगई है, जिस पर राज्य सरकार पूर्णरूप से विफल नजर आ रही है, प्रदूषण में जब भी कोई कमी देखने को मिली तो उसमे केन्द्र सरकार का सहयोग रहा है | दिल्ली में प्रदूषण अब लगभग पूरे सीजन ही खतरनाक स्तर से ऊपर ही रहता है और दिल्ली सरकार ने अपने नए कार्यकाल में 30 करोंड का बजट भी आवंटित किया परन्तु यह बजट सिर्फ दिल्ली सरकार के प्रचार सामग्री में ही सिमट कर रह गया | दिल्ली में ओड-इवन से लेकर बत्ती-ऑन, इंजन-ऑफ जैसे कई कैंपेन भी लांच किये लेकिन बुनियादी समस्याओं को गौर न करने की वजह से यह भी असफल साबित हुआ |

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