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दिशाहीन सरकार की योजनायें और वर्क फ्रॉम होम के नाम पर निजी कम्पनियों द्वारा शोषण

कोरोना महामारी संक्रमण ने पूरे विश्व के हालात घुटनों के बल पहुंचा दिए हैं, अर्थव्यवस्था वैश्विक स्तर पर चरमरा चुकी है और भारत में पहले ही अर्थव्यवस्था घुटनों के बल चल रही थी, जिसका सबसे ज्यादा खामियाजा निजी कम्पनियों में काम करने वाले कर्मचारियों को भी भुगतना पड़ रहा है, कहने को मजदूरों और गरीबों को बेहद मुश्किल दौर से गुजरना पड़ रहा है लेकिन वास्तविकता यह है कि निजी कम्पनियों में काम करने वाले लोगों के साथ भी कम अत्याचार नही हो रहा है | गरीबों और मजदूरों के लिए फिर भी सहानुभूति रखते हुए लोग और विभिन्न संगठन मदद हेतु आगे आये और अभी भी आ रहे हैं लेकिन नौकरीपेशा लोगों के लिए कोई भी आगे नही आ रहा है | आज के समय में नौकरीपेशा वाला व्यक्ति सबसे ज्यादा शोषित और सुविधाओं से वंचित है |

जब से पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा की गयी है उसके बाद से बहुत सी निजी कम्पनियों ने अपने कर्मचारियों को घर से ही काम करने के लिए अनुमति दे दी, पहले तो कर्मचारियों को सुनकर अच्छा लगा लेकिन जैसे-जैसे समय व्यतीत होने लगा उनके लिए कई तरह की मुसीबते बढ़ने लगी |

लॉकडाउन बढ़ा, सैलरी घटी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 24 मार्च को पूरे देश में लॉक डाउन की घोषणा की, आज 2 महीने से अधिक का समय व्यतीत हो चुका है, अब कई निजी कम्पनियों ने कमाई के रास्ते बंद होने का हवाला देकर अपने कर्मचारियों के वेतन की कटौती शुरू कर दी, इसके बाद भी कुछ कर्मचारियों की लॉक डाउन के नाम पर छटनी भी शुरू कर दी, चूँकि कोरोना काल में खौफ इस कदर है कोई भी कर्मचारी अपनी नौकरी नही गंवाना चाहता है ऐसे में उन्हें वेतन कटौती से बहुत ज्यादा तकलीफ नही हुई लेकिन कई हजार कर्मचारी आज बेरोजगार घूम रहे हैं, क्यों कि निजी कम्पनियों ने यह कह कर उन्हें निकाल दिया है कि उनके पास अब पैसे नही है और वह अब खर्चा नही उठा सकते हैं, कम्पनियों ने नौकरी खात्मे का भय इस कदर अपने कर्मचारियों में बैठा दिया है कि उनकी वेतन में धड़ल्ले से कटौती की जा रही है उसके बावजूद भी वो कुछ भी न बोल पा रहे हैं न ही कोई कदम उठा पा रहे हैं |

8 की बजाय अब 16 घंटों की ड्यूटी

निजी कम्पनियों में काम करने वाले कर्मचारी एक तरफ वेतन में कटौती की तकलीफ झेल रहे हैं तो दूसरी ओर उनके काम करने की कोई समय-सीमा ही नही रह गयी है, पहले सामान्यतः 7 से 9 घन्टे की नौकरी रहती थी लेकिन आज हालात ये हो गये हैं कि 12 से 14 घन्टे काम करना पड़ रहा है और चूँकि ऑफिस नही जा रहे हैं तो कहीं न कहीं कोआर्डिनेशन की भी समस्या का सामना करना पड़ जाता है | मेरे कई मित्र हैं जो निजी कम्पनियों में काम करते हैं और वो अपने अनुभव साझा करते हैं कि आज कल उन्हें पहले की तुलना में लगभग दोगुना काम दिया जा रहा है और वेतन के मामले में कोरोना का बहाना बोलकर उसमे कंपनी मनमर्ज़ी कटौती कर रही है, समय की मज़बूरी ऐसी है कि कहीं और नौकरी मिलना भी संभव नही है ऐसे में कोई रिस्क नही लेना चाह रहा है और जैसा चल रहा है उसी में संतोष कर रहे हैं |

दिशाहीन सरकार की योजनायें

हालात की मार इसलिए भी अधिक महसूस हो रही है कि इस कोरोना महामारी संक्रमण में सरकारों का रवैया बेहद निराशाजनक रहा है, केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकार किसी ने भी योजनाबद्ध तरीके से कोई भी कार्य नही किया, केन्द्र सरकार ने 20 लाख करोंड का पैकेज तो जारी कर दिया लेकिन मध्यमवर्गीय और गरीब तबका आज भी चारो ओर मुसीबतों से घिरा हुआ है, नौकरीपेशा व्यक्ति इस कदर मजबूर है न वो रो सकता है न खुश रह सकता है, राज्य सरकार अपने तरीके से कानून बना रही है और केन्द्र सरकार अपने तरीके से, सरकारी सहायता उन्हें ही मिल पा रही है जो स्वयं इसको लेने की क्षमता रखते हैं, जरूरतमंद आज भी उसी स्थिति में हैं जैसा पहले था, सरकार ने निजी कम्पनियों पर कोई भी रोक नही लगायी है और न ही कोई ऐसे नियम बनाये है जिससे नौकरीपेशा व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित महसूस कर सके, नौकरियां धड़ल्ले से ख़त्म हो रही हैं और सरकार मध्यमवर्ग को नजरंदाज़ कर रही है |

यह लेख सरकारी हेल्पलाइन के निदेशक वैभव मिश्रा के द्वारा लिखा गया है

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