Corona Warrior Interview

हुमानिटरियन ऐड इंटरनेशनल ने संभाली हजारों परिवारों की जिम्मेदारी

जब कोरोना महामारी संक्रमण ने भारत पर हमला किया, तो लॉकडाउन की अवधि के दौरान लोगों की सहायता के लिए विभिन्न संगठनों का आगे आना बहुत स्वाभाविक था। सबसे ज्यादा प्रभावित लोग प्रवासी श्रमिक थे, लेकिन कोरोना के बढ़ते प्रभाव के कारण भारत सरकार को पूर्ण लॉक डाउन की घोषणा करनी पड़ी जिससे सबसे ज्यादा प्रभवित कारीगर, मजदूर, रिक्शा चालक और जो भी बहुत से लोग जो प्रतिदिन की कमाई पर निर्भर थे उनके लिए लॉक डाउन के समय में पर्याप्त भोजन प्रबंध ही सबसे बड़ी चिंता का विषय बना हुआ था। ऐसे में हुमानिटरियन ऐड इंटरनेशनल @humanaidint नामक संगठन ने पीड़ित लोगों के लिए जीवनदायनी साबित हुई, जिसके माध्यम से हजारों गरीब परिवारों को प्रतिदिन भोजन पहुँचाया जा रहा है। हालाँकि अभी 12 दिन लॉक डाउन के और हैं ऐसे में इस संस्था के फाउंडर सुधांशु एस. सिंह @sssingh21 , अध्ययक्ष एन. एम. प्रुष्टि और बोर्ड मेम्बर एवं भोजन वितरण प्रमुख सुधीर @seriousfunnyguy से हमारी सहयोगी आशू शुक्ला @ashu_29shukla ने बातचीत कर जानने की कोशिश करी कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर यह संगठन कैसे पूरा प्रंबंध कर पा रहा है और उन्हें किस प्रकार की समस्याओं का सामना भी करना पड़ रहा है।

सवाल: कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन में लोगों को जो परेशानियां हो रही है, चाहे बात राशन की हो या आर्थिक मदद की ऐसे में आप आप लोग अपनी संस्था के माध्यम से कैसे सहायता कर रहे हैं? 

जवाब: अचानक लॉकडाउन की घोषणा हुई जिससे जो लोग रोजमर्रा काम कर रहे थे वह सभी घर पर बैठ गए। प्रवासी कामगारों के काम छूट गए, रिक्शेवाले और रोज काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों के काम बंद हो गए, ऐसे में इन लोगों को हो रही परेशानी ख़त्म करना हमारा उद्देश्य था| तभी रातों रात हमने उत्तरी दिल्ली के यूनिवर्सिटी इलाके में एक रसोईघर स्थापित किया, जहां से हमने 1000 पैकेट खाने के बनाने शुरू किए, लेकिन दोपहर तक ही हमें यह पता लगा कि 1000 पैकेट से कुछ नहीं होने वाला है। उसी दिन उत्तम नगर में हमने जल्दी से वहां भी एक रसोईघर सेटअप किया जहां हमने 500 पैकेट बनाने शुरू किए। अगले ही दिन किराड़ी गांव में एक और रसोईघर सेट किया क्योंकि टिकरी बॉर्डर, हिंद विहार, किराड़ी गांव, घेवरा मोड़ जहां से सबसे ज्यादा मदद के लिए फोन आने लगे और 2 दिन के अंदर हमने 2500 पैकेट खाने के जरूरतमंद लोगों को बाँटे।  

सवाल: कोरोना महामारी, लॉक डाउन और लोगों की मदद, तीनों के बीच चुनौतियां भी काफी आई होंगी तो किन चुनौतियों का सामना आपको करना पड़ा?  

जवाब: पोषण हमारे लिए सबसे बड़ी चिंता थी। साथ ही सबसे बड़ी चुनौती हमारे लिए यह थी कि लॉक डाउन के कारण मार्केट और दुकानें बंद हैं तो किराने का सामान खरीदना सबसे बड़ी चुनौती थी। खाना बनाने के बाद पैकेट का इंतज़ाम करके उसे पैक करना भी एक चुनौती से कम नहीं था। इसीलिए हमने अल्मुनियम फॉयल का इस्तेमाल ना करके सिर्फ एक पॉलिथीन में खाना पैक करने का विचार किया क्योंकि हम चाहते थे कि पैकेजिंग पर कम कॉस्टिंग हो और ज्यादा से ज्यादा जरूरतमंद लोगों की मदद हो इसीलिए ये भी हमारी चुनौती का ही हिस्सा था।  

सवाल: लोगों को मदद के तौर पर पैकेट में खाने की क्या-क्या चीजें आप उनको दे रहे हैं?  

जवाब: हमने ऐसा खाना चुना जो कि पॉलीबैग में ही आ जाए, जिससे डोंगे, कटोरियां या चम्मच जैसी चीजों की आवश्यकता ना पड़े। दोपहर में हम वेज पुलाओ देते हैं, जिसमें सोयाबीन और विभिन्न सब्जियां होती है और रात के खाने में हम पूरी और सूखे आलू की सब्जी देते हैं। हम इसका पूरा ख्याल रखतें हैं कि लोग पेटभर खाना खा सके इसिलए उन्हें अगर दोबारा कुछ चाहिए हो तो उन्हें उसी समय और भोजन दे देते हैं।  

सवाल: जैसा कि आप रोजाना 2500 लोगों की मदद कर रहे हैं, तो इसकी फंडिंग आपको कहीं से मिल रही है या खुद आपका एनजीओ ही सारा खर्चा उठा रहा है?  

जवाब: हमारे खुद के एनजीओ से ही सारे खर्चे मदद के लिए करे जा रहे हैं। साथ ही ट्विटर के माध्यम से लोग पेटीएम के जरिए भी अपना कॉन्ट्रिब्यूशन दे रहे हैं। लोग काफी सालों से हमारे एनजीओ के बारे जानते हैं तो कहीं न कहीं लोगों में जो एक विश्वास बना हुआ है उसका लाभ भी हमे मिल रहा है, इसीलिए ट्विटर के माध्यम से वह अपना योगदान भी भेज देते हैं। ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म की मदद से हम लोगों को मदद पहुंचा रहे हैं और आज के समय में न केवल मेरे लिए बल्कि और भी बहुत से लोगों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफार्म मदद के लिए सबसे बड़ा माध्यम है।  

सवाल: आपके एनजीओ में कितने लोग काम कर रहे हैं, कितने लोगों की टीम है इस मदद के पीछे?  

जवाब: हमारी 4 लोगों की टीम है। साथ ही एक बच्ची है 18 साल की जो कि किराड़ी गांव में रहती है और वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती है। उसने अपने चार-पांच दोस्तों के साथ मिलकर किराड़ी गांव का हमारा रसोईघर संभाला हुआ है।  

सवाल: जैसा कि सरकार ने निर्देश दिए हैं कि कोरोना महामारी में सोशल डिस्टेंसिंग बहुत जरूरी है। इस बारे में आपसे जानना चाहूंगी कि आप सभी नियमों का पालन कैसे कर रहे हैं? 

जवाब: बिल्कुल, अभी हमने 24 लाख का सूखा राशन, लगभग 720 परिवारों को दिया है, वह भी बहुत खूबसूरती के साथ सोशल डिस्टेंसिंग को ध्यान में रखते हुए। साथ ही लोगों ने हमें टि्वटर पर टैग करना भी शुरू किया। ट्विटर के माध्यम से अलग-अलग जगह से मदद की पुकार थी जो कि लॉक डाउन के चलते वहां पहुंचना असंभव था, तो हमने उन्हें फोन करना शुरू शुरू किया और कहा कि आप अपने आसपास के राशन की दुकान पर जाएं जो आप को सामान लेना हो वो लेने के उपरांत दुकानदार से मेरी बात करवाइए और पेटीएम के जरिए मैं पैसे भेज देता हूं। उस समय सारी बिलिंग हमारे एनजीओ के नाम पर होती है। ऐसे में हमने डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हुए 20 दिनों के अंदर 180 परिवारों की भी मदद करी।

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